क्या - एक ग़ज़ल



क्या तुम्हारा दिल भी बहुत भारी है
क्या तुम्हे भी इश्क़ की बीमारी है

क्या नज़रे मिलते ही झुक जाती है
क्या उसकी आँखों मे भी बेकरारी है

क्या उसकी गली मे रोज़ जाते हो
क्या मार खाने की तैयारी है

क्या उसके ख़याल मे गुज़रता है सारा दिन
क्या तुम्हारी नौकरी सरकारी है

क्या कुछ ना कह पाये आज भी उस से
क्या कहने को बातें भी बहुत सारी है

क्या ख्वाब सारे उसी के आते है
क्या नींद मे भी जुस्तजू जारी है

क्या दुनिया मे लाना ही एक काम था तेरा
क्या उसके आगे भी कोई ज़िम्मेदारी है

क्या बेच दी ग़ज़ल चंद सिक्कों की खातिर
क्या 'अश्क़' की यही खुद्दारी है

~अश्क़ जगदलपुरी 

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